क्यूँ कोई शख़्स जाना पहचाना सा लगने लगा है…

आज वही मौसम बदलने सा लगा है,
क्यूँ कोई शख़्स जाना पहचाना सा लगने लगा है,
ये अनजाने रिश्ते कब तलक तड़पाएगी मुझे,
क्यूँ कोई अपना भी बेगाना सा लगने लगा है,
आज वही मौसम बदलने सा लगा है,
क्यूँ कोई शख़्स जाना पहचाना सा लगने लगा है॥

हर मंज़र में जिसके ख़्वाब बुनता था कभी ये दिल,
वो पास होकर भी क्यूँ अनजाना सा लगने लगा है,
आज वही मौसम बदलने सा लगा है,
क्यूँ कोई शख़्स जाना पहचाना सा लगने लगा है॥

कभी ख़्वाबों को हकीकत बनते देखा था,
आज हकीकत को ख़्वाब बनते देखा है,
हर मौसम में जिसकी खुशबू आती थी फिज़ाओं से,
आज वही मौसम कुछ बदलने सा लगा है,
आज वही मौसम बदलने सा लगा है,
क्यूँ कोई शख़्स जाना पहचाना सा लगने लगा है॥

कल तक तो वो अपनों में शामिल थी,
आज वो गैरों में एक,
कल तक जिनके लिए ख़्वाब थे इन आँखों में,
आज वो कातिल बेवफ़ा सा लगने लगा है,
आज वही मौसम बदलने सा लगा है,
क्यूँ कोई शख़्स जाना पहचाना सा लगने लगा है॥

क्यूँ कोई शख़्स जाना पहचाना सा लगने लगा है…” के लिए 2 प्रतिक्रियाएं

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