फिर तुम याद आने लगे तन्हाइयों के आलम में…

फिर तुम याद आने लगे तन्हाइयों के आलम में,
हर पल खामोशी का मंज़र है मेरी इन तन्हाइयों में,
डूब जा आके मेरी यादों की गहराइयों में,
कि हर पल तुझमे समाया हूँ तेरी ही परछाइयों में,
मेरी तो हर शाम तेरी ही यादों मे गुजरने लगी है,
हर पल तेरा ही ख्याल अब रहता है,
ज़िक्र होता है तो लब पे आ जाती है तेरा ही नाम,
तू कभी झांक के देख ले मेरे दिल के गहराइयों में…

फिर तुम याद आने लगे तन्हाइयों के आलम में…” के लिए एक प्रतिक्रिया

  1. aise to maine apk pehle v kha hai ki apki lekhni ki koi sima nhi hai…
    isi bat par maine v kuch arg kiya …..

    फिजाओ से अब भी उनकी आने की महक आती है|
    हवायें अब भी उनकी होने की मजुदगी का ऐहसास दिलाती है |
    पर वो बेखबर अपने ही रंगों में इसकदर रंगी हुई है,
    कि उन्हें मेरी पल पल तड़प की ऐहसास कहा |

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